कविता
आसमान को काला कर दे
आसमान को काला कर देहर नदिया को नाला कर देहरी-भरी सुंदर धरती कोगिट्टी पत्थर वाला कर देपॉलीथिन के ढेर लगा देघास कुचल दे,पेड़ गिरा देसारे सुन्दर ताल सुखाकरघर-आंगन बाज़ार बना देमज़हब की दीवार बना देरिश्तों का हर रूप मिटा देज़ात-पात के रंग दिखा करदुर्गम पहरेदार बिठा देपत्थर को भगवान बना देमुल्लों को मीनार चढ़ा देसांस न पाए कोई सुख कीऐसा ये संसार बना देमोबाइल फ़ोनों में रम जाबंद घरों, कमरों में थम जाचला के टीवी मंहगा वालाएक जगह कुर्सी पे जम जाबाग़ो को फ़र्नीचर कर देआमों को बोतल में भर देखेतों में तू सड़क बना करफ़सलों की बेदख़ली कर देकभी तो थोड़ी रोक लगा देकभी तो अच्छी सोच बना लेनहीं रहेगा कुछ भी जीवितइस धरती की जान बचा ले