आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

एक ज़माना था

एक ज़माना थाजब बचपन मेंतू मां-बाप के लिएतोतली ज़बान थालेकिन अबतू मां-बाप के लिएमार्कशीट हैतेरे नम्बर हीउनकी हार्टबीट हैएक ज़माना थाजब अस्पताल मेंतू मरीज़ थातू ही डॉक्टर काअज़ीज़ थालेकिन अबतू मात्र एक बिल हैतुझसे क़ीमती तोतेरी किडनी हैदिल हैएक ज़माना थाजब बहन-बेटियों सेगाँव आबाद थाऔर उनका पतिगाँव भर कादामाद थालेकिन अबवो मात्र लड़की हैउसकी पढ़ाईऔर शादी न होनागाँव की शर्म नहींउसके मां-बाप कीकड़की हैएक ज़माना थाजब तेरा कामदफ़्तर की ज़िम्मेदारी थाबाबू तेरी चाय पीकर हीआभारी थालेकिन अबतू अफ़सर कीफ़ाइल हैऔर वो अबजनता का नहींपैसे का काइल हैएक ज़माना थाजब तेरे खेत मेंसिर्फ़ तेरी दख़ल थीदेश का मतलब हीतेरे खेत की फ़सल थीलेकिन अब तूबिना खेत काकिसान हैतेरा खेत तोसीमेंट का जंगल हैजिसमें तुझे छोड़सबका मकान हैएक ज़माना थाजब अज़ान सेतेरी सुबहऔर आरती सेशाम थीभारत के नाम से हीपहचान तमाम थीलेकिन अबतू सिख, ईसाई, हिन्दूया मुसलमान हैतेरे लिएअब देश नहींतेरा मज़हब हीमहान है