आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

कैसे कह दूँ कि मैं भी इंसा हूँ

कैसे कह दूँ कि मैं भी ज़िन्दा हूँकैसे कह दूँ कि मैं भी इंसा हूँउसने देखे थे यहाँ ख़ाब कईउसके छाँटे हुए कुछ लम्हे थेसर्द फ़ुटपाथ पर पड़ी थी जहाँ बेसुध वोवहीं छितरे हुए थे अहसास कईलेकिन अब वो ख़ाब नहीं सदमे थेइक तरफ़ कुचला हुआ वो घूँघट थाजिसे उठना था किसी ख़ास रातमगर वो रात अब न आएगी कभीन शहनाई, न सेहरा, न बाबुल गाएगी कभीलेकिन मुझे तो काम थे बहुतजिनसे जाना थाउसे उठाने के लिए तो सारा ज़माना थायूँ ही गिरी पड़ी रही बेसुध वोमगर मैं रुक न सका पल भर कोकैसे कह दूँ कि मैं भी ज़िन्दा हूँकैसे कह दूँ कि मैं भी इंसा हूँ