आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

क्यों विलग होता गया

आज निर्गत, नीर निर्झर नयन से होता गयात्याग कर मेरा हृदय वह क्यों विलग होता गयाशब्द निष्ठुर, रूठकर करते रहे मनमानियांप्रेम का संदेश कुछ था और कुछ होता गयामैं अधम, शोषित हुआ, अपने ही भ्रामक दर्प सेक्रूर समयाघात सह, अवसादमय होता गयाकर रही विचलित, कि ज्यों टंकार प्रत्यंचा की होनाद सुन अपने हृदय का मैं द्रवित होता गयामैं, अपरिचित काल क्रम की रार में विभ्रमित थावह निरंतर शुभ्र तन औ शांत मन होता गया