आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

जैसे संसार हमारा है

बीते लम्हों की यादों सेअब उठें, भव्य उजियारा हैइस नए साल को, यूँ जीएँजैसे संसार हमारा हैहम जीने दें और जी भी लेंविश्वास जुटा कर उन सब मेंजो बात-बात पर कहते हैंहमको किस्मत ने मारा हैअब रहे दामिनी निर्भय होनिर्भय इरोम का जीवन होअब गर्भ में मुसकाये बिटियायह अंश, वंश से प्यारा हैफ़ेयर ही लवली नहीं रहेअनफ़ेयर यही अफ़ेयर होकाली मैया जब काली हैतो रंग से क्यों बंटवारा हैये ज़ात-पात क्या होती हैमाता की कोई ज़ात नहींयदि पिता ज़ात को रोता हैतो कैसा पिता हमारा हैजाने कब हम ये समझेंगेना जाने कब ये जानेंगेमस्जिद में राम, मंदिर में ख़ुदाहर मज़हब एक सहारा हैसुबह आज़ान जगाए हमेंमंदिर की आरती झपकी देसपनों में ख़ुदा या राम बसेंमक़सद अब प्रेम हमारा हैसहमी मस्जिद को बोल मिलेेंमंदिर भी अब जी खोल मिलेंगिरजे गुरुद्वारे सब बोलेंजय हो ! यह देश हमारा है