कविता
तुम क्षमा कर दो उन्हें भी
तुम क्षमा कर दो उन्हें भीजो तुम्हारे सत्य पथ परकंटकों का जाल चारों ओर सेबिखरा रहे थेऔर तुमकोछद्म-जीवन राह भी दिखला रहे थेऔर उनको भी क्षमा कर दोकि जिनमें, ईर्ष्या ही ईर्ष्याका भाव थाबस स्वार्थवश हीथा प्रदर्शन प्रेम कास्वत: उनको, मुस्कुरा करदान देना परम करुणा से भरे मनऔर अंतर हृदय से तुमजिनका विरोधी स्वर बना कारणतुम्हारे परम सुखमय आज काअपने निजी आकाश कास्मरण होलाओत्से ने क्या कहा था-“हो सहज मनऔर करुणा होसभी के प्रति तुम्हारी”ध्यान मत देनाकनफ्य़ूशस के कथन पर-"जो बिछाएँ शूल, राहों में निरंतरउन्हें सम्मानित करो मत फूल देकरक्योंकि इससे रूठ जाएँगे सभी वेसेज फूलों से सजाते हैं तुम्हारी”अरे तुम सुन रहे हो ना ?तुम्हारे जो भी अपने हैंवो तो हर हाल अपने हैंयदि कोई ‘हाल’ ऐसा हैजहाँ होंगे विरोधी वेतो फिर ये जान लोभ्रम है तुम्हें ये आज भीकि वे तो मेरे अपने हैंरखोगे तुम क्षमा भीतरतभी तो प्रेम भी होगानहीं तो प्रेमसुख की लालसा का ही व्यसन होगामेरी मानो!क्षमा कर दो !क्योंकि तुम प्रेममय हो।