कविता
तू जुलम करै अपनौ है कैं
तू जुलम करै अपनौ है कैंऽऽऽतू जुलम करै अपनौ है कैंकाऊ और की बात करुँ मैं काअब दिनाउँ तो मो पै कटतु नायऔर रात की बात की करुँ मैं कातू जुलम करै अपनौ है कैं...सपने ऐसे तू दिखाय गयौऔर आंखिन मेंऊ बसाय गयौआवाज हर एक लगै ऐसीतू आय गयौ तू आय गयौतू जुलम करै अपनौ है कैं...तू समझ कैंऊँ नाय समझ रह्यौतू जान कैंऊँ नाय जान रह्यौमोहे सबकी बात चुभैं ऐसीजैसे तीर कलेजाय फार रह्यौतू जुलम करै अपनौ है कैं...का करूँ तीज त्यौहारी कौका करूँ मैं होरी दिवारी कौअब कौन के काजें सिंगार करूँका करूँ भरी अलमारी कौतू जुलम करै अपनौ है कैंऽऽऽ