कविता
दिल को ही सुनाने दो
गर जो गुमनाम हैं, गुमनाम ही मर जाने दोअब तो कोई और करो बात, इसे जाने दोदिल की सुनते हैं, जीते हैं अपनी शर्तों पेशौक़ ए शौहरत है जिसे, उसे ही कमाने दोबात बन जाएगी कोई दिल जो हमें चाहेगाजो भी अपना है उसे पास तो बुलाने दोचंद तनहाई भरे लम्हे, अपनी दौलत हैअब किसी यार से मिल के इसे लुटाने दोख़ुद से कहते हैं, ख़ुद ही इन्हें सुन लेते हैंदिल के नग़्में हैं इन्हें दिल को ही सुनाने दोएक तो इश्क़ है, दूजा है ग़म जुदाई काऔर कोई बात नहीं यही हैं फ़साने दोकिसी का तोड़ के दिल चैन कहाँ मिलता हैप्यार से मौत भी आए तो उसे आने दो
