आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

नहीं बीतता प्यार

यह कविता मैंने अपनी शादी के पच्चीस बरस होने पर लिखी थी। (हे भगवान ! अब तो बत्तीस हो गए... पूरे बत्तीस...)एक दशक बीतादूजा भी बीताऔर तीसरा आधापच्चीस बरस हो आएऐसे गुज़री-वैसे गुज़रीकैसे गुज़री ?है हिसाब क्या !जीवन का संग्राम लड़ा हैमैंने तुमनेसाथ रही होतुम तो मेरेसाथ ही रहनायाद दिलाऊँ तुमको क्या-क्याएक पाँच का सिक्काटुकड़ा इक भुट्टे काएक छुअन और एकगंध है पास तुम्हारेयादों में है साथ तुम्हारेमैं भी तो हूँ साथमगर मैं कहाँ हूँ तुमसालेकिन मुझको यादगुलाबी चुन्नीवो बादलवो बिजलीवो बूंदेंवो सिहरनऔर तुम्हारा साथनहीं भूला हूँ कुछ भीकैसे-कैसे जतन हमारेबच्चों को पाला था कैसेजागे कैसे भागे कैसेसारी-सारी रातएक युग बीत गया हैयुग तो बीता ही करते हैंनहीं बीतता प्यारजब तक मैं हूँजब तक तुम होजब तक है संसारनहीं बीतेगा कुछ भी...