कविता
बहुत फ़ज़ीता है
कौन सहारे विश्वासों के जीता है?कौन दिवा स्वप्नों की मदिरा पीता है?मार दिया उसको ही जिसने मुँह खोलाया फिर जेलों में ही जीवन बीता हैभरी जेब वालों के भीतर मत झांकोसब कुछ भरा मिलेगा, दिल ही रीता हैनहीं आसरा मिलता हो जब महलों मेंकोई झोंपड़ी ढूंढो, बहुत सुभीता हैख़ैर मनाओ यार! अभी तुम ज़िन्दा होरोज़ ज़हर खाकर भी कोई जीता है ?नेताओं के सच्चे झूठे झगड़ों मेंवोटर अपना फटा गरेबाँ सीता हैख़ुदा और भगवानों की इस दुनिया मेंएक भले मानुस का बहुत फ़ज़ीता है।