आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

भारत को स्वयं बनाओ

'हम' क्या कर सकते हैं ?बहुत हो चुका-'मैं' क्या कर सकता हूँ !इस पर आओबिना रीढ़ के लोगों सेक्या कहनासपनों के भारत कोस्वयं बनाओसंभावित रस्तेअब हुए पुरानेनई राह परनई रौशनी लाओमूक-बधिर क्या बोलेंऔर सुनेंगेतुम उद्घोष कर्म काकरते जाओइनके भ्रष्ट आचरणको क्या रोनापौध नई तुमबगिया में महकाओआँखें नहीं है झुकतीझुकी है गर्दनऐसे बेशर्मों सेदेश बचाओऔरों से फिरकहना सुनना होगापहले ख़ुद हीसही ठिकाना पाओराष्ट्र प्रेम हैनहीं सिर्फ़ बातों सेसचमुच हीकुछ करके दिखला जाओदेकर योगदानतुम पहले अपनाभारतकोश 'बढ़ाने' मेंजुट जाओ