आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

भार्या पुरुषोत्तम

हे कृष्ण !उत्तरा के गर्भ मेंबनकर गदाधारीरक्षा की परीक्षित की, ब्रह्मास्त्र सेक्योंकि वो वंश हैऔर बेटी ?बेटी क्या शाप है, दंश है ?बेटी भी तो, पुत्र की तरह हीतुम्हारा ही अंश हैन जाने कितनी बेटियाँमारी गईं, गर्भ मेंऔर तुम्हारा भी मौन हैइस संदर्भ मेंइन बेटियों को बचाने भीतो कभी आतेइन कंसों का संहार भी कर जातेहे राम !पिता के वचन के लिएछोड़ दी राजगद्दीसीता को साथ ले, बने वनवासीक्योंकि वो मर्यादा हैऔर सीता ?सीता क्या दासी है, धरमादा है ?तुम्हारा जो कुछ भी हैउसमें सीता का भी तो आधा हैकैसे गई सीतातुम्हारे बिना दोबारा वन कोक्यों नहीं छोड़ातुमने राजभवन कोऐसे में तुम भी तो साथ निभातेतभी तो'भार्या पुरुषोत्तम' भी बन जातेहे बुद्ध !छोड़ा यशोधरा-राहुल कोसन्न्यास लियानया पाठ सिखलाया दुनिया कोक्योंकि वो 'धर्म' हैऔर यशोधरा ?यशोधरा क्या वस्तु है, मात्र वैवाहिक कर्म है ?उसे, सोते छोड़ जानाभी तो अधर्म हैयदि तुम्हारे पिता नेतुमको इस तरह छोड़ा होतातो फिर, बुद्ध क्यासिद्धार्थ भी नहीं होतापहले गृहस्थ को निभातेतो तुम्हारी प्रवज्या कोराहुल और उसकी मां भी समझ पाते