कविता
ये वक़्त कह रहा है
मरना तो सबका तय है, ये वक़्त कह रहा हैपुरज़ोर एक कोशिश, जीने की बारहा हैकहने को सारी दुनिया है इश्क़ की दीवानीहर एक शख़्स लेकिन, पैसे पे मर रहा हैसारे सिकंदरों के, जाते हैं हाथ ख़ालीकोई मानता नहीं है, बस याद कर रहा हैहैवानियत के सारे, होते गुनाह माफ़ीअब बेटियों का पल्लू ही क़फ़्न बन रहा हैकोई खुदा नहीं है, अब आसमां में शायदइन्सां का ख़ौफ़ देखो, भगवान डर रहा है