आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

वो सुबह कभी तो आएगी

वो 'सुबह' जो कभी आनी थीकब आएगी ?जिस सुबह को,सकीना भी स्कूल जाएगी ?नहीं टपकेगी सुक्खो की छतऔर संतो दादी भी पेंशन पाएगीकल्लो नहीं धोएगी रईसों के पोतड़ेऔर चंदर की शराब भी छूट जाएगीपरसादी छोड़ देगा तीन पत्ती खेलनाऔर सुनहरी भी मायके से लौट आएगीबैजंती छुड़ा लेगी चूड़ियाँ सुनार सेऔर दोबारा 'रखने' भी नहीं जाएगीहवालात से छूटेगा बेकसूर घूरेलालऔर पुलिस भी बार-बार नहीं आएगीइस बार सोनदेई जनमेगी बिटिया कोऔर उसकी सास भी घी के दीए जलाएगीऐसी सुबह मेरे गाँव में कब आएगी ?ऐसी सुबह तेरे गाँव में कब आएगी ?