कविता
हँस के रो गए
मसरूफ़ अपनी ज़िन्दगी में इतने हो गएसब मुफ़लिसी के यार, शोहरतों में खो गएशतरंज की बाज़ी पे वो हर रोज़ झगड़नाख़ाली बिसात देखकर हम हँस के रो गएइमली के घने साए में कंचों की दोपहरअब क्या कहें, साए भी तो कमज़र्फ हो गएहर रोज़ छत पे जाके पतंगों को लूटनाछत के भी तो चलन थे, शहरों में खो गएसावन की किसी रात में बरसात की रिमझिमअब मौसमों की छोड़िये, कमरे जो हो गएसत् श्री अकाल बोल के लंगर में बैठनाअब इस तरहा के दौर, बस इक ख़ाब हो गएबिन बात के वो रूठना, खिसिया के झगड़नाजो यार ज़िन्दगी के थे, अब दोस्त हो गए