कविता
इन मंजिलों को शायद
इन मंजिलों को शायदकुछ रंजिशें हैं मुझसेजो रास्ते सफ़र केमुश्किल बता रही हैंजो मेरा आसमां हैवो मेरा आसमां हैफिर कौन सी ग़रज़ से,ये हक़ जता रही हैंये कौन से तिलिस्मीआलम की दास्तां हैजो राहते जां होतीं,वो भी सता रही हैंगुज़रे हुए ज़माने कीकैसे कैफ़ीयत दूँअब और क्या बताऊँ,क्या-क्या ख़ता रही हैंक्या ढूंढते हो?सूरज?वो यूँ नहीं मिलेगासूरज की हर किरन ही,उसका पता रही हैं