कविता
हर शख़्स मुझे बिन सुने
एक गुमनाम किसान गजेन्द्र द्वारा, सरेआम फांसी लगा लेने पर...
हर शख़्स मुझे बिन सुने आगे जो बढ़ गयातो दर्द दिखाने को मैं फांसी पे चढ़ गयामहलों के राज़ खोल दूँ शायद में इस तर्हाइस वास्ते ये ख़ून मेरे सर पे चढ़ गयाकांधों पे जिसे लाद के कुर्सी पे बिठायावो ही मेरे कांधे पे पैर रख के चढ़ गयाकिससे कहें, कैसे कहें, सुनता है यहाँ कौनकुछ भाव ज़माने का ऐसा अबके चढ़ गयाजब बिक रहा हो झूठ हर इक दर पे सुब्ह शाम'आदित्य' ये बुख़ार कैसा तुझपे चढ़ गया