आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

इस शहर में

इस शहर में अब कोई मरता नहींवो मरें भी कैसे जो ज़िन्दा नहींहो रहे नीलाम चौराहों पे रिश्तेक्या कहें कोई दोस्त शर्मिंदा नहींघूमता है हर कोई कपड़े उतारेशहर भर में अब कोई नंगा नहींकौन किसको भेजता है आज लानतइस तरह का अब यहाँ मसला नहींहो गया है एक मज़हब 'सिर्फ़ पैसा'अब कहीं पर मज़हबी दंगा नहींमर गये, आज़ाद हमको कर गये वोउनका महफ़िल में कहीं चर्चा नहींअब यहाँ खादी वही पहने हुए हैंजिनकी यादों में भी अब चरख़ा नहींइस शहर में अब कोई मरता नहींवो मरें भी कैसे जो ज़िन्दा नहीं