आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

पत्थर का आसमान

पूस की रात नेआषाढ़ के एक दिन से पूछा"बड़ी तबियत से उछाला था पत्थर तुमनेआसमान मेंसूराख़ हुआ क्या ?"परबत सी पीर लियेदिन बोला"एक नहींहज़ारों उछाले गयेपत्थरों को वो लील गया"असल में हम भूल जाते हैंकि हमारे उछाले हुए पत्थरजैसे हीऊपर जाते हैंकमबख्त वो भीआसमान बन जाते हैंकि उसमें सूराख़ करना तोदूर की बात हैहम तो उन्हेंख़रोंच भी नहीं पाते हैंमुंशी प्रेमचन्द की कहानी 'पूस की रात', मोहन राकेश के नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' और दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों की स्मृति मेंकैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकताएक पत्थर तो तबियत से उछालो यारोहो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिये,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये -दुष्यंत कुमार