आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

क्या यही है मेरी शिकस्त ?

फ़रमाइए...क्या यही हैमेरी शिकस्त ?न कोईरहम काबंदोबस्तकि झेल पाऊँइन बातों कोजो दिल कोझकझोरती हैंज़बर्दस्त, ज़बर्दस्तन कसूर मेरान गिला कोई मुझकोफिर भीहर मोड़ परहर वक़्तमुझे जलालत काअहसास करातेकि मुझे होअहसास-ए-बदबख़्तआमादा हैंमुझे बनाने कोइंसां से फ़रिश्ताहर वक़्तऔर ख़ुद लूटते मज़ेआदम ज़ात होने केकरके तिलिस्मीबंदोबस्तऔर करते हैंउम्मीद मुझसेकि मैं जीऊंकिसी फ़क़ीर की तरहाकहीं किसीदश्त मेंमदमस्तक्या यही हैमेरी शिकस्तक्या यही हैमेरी शिकस्त