आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

मैं किसान हूँ भारत का

मैं किसान हूँ भारत काऔर सबका अन्न-विधाता हूँसब जन्म मुझी से पाते हैंसब मेरी पैदा खाते हैंअन्न-खाद्य सामग्री सबमैं तुमको देता आया हूँफिर भी तुमने क्यों समझा हैज्यों मैं ग़ैरों का जाया हूँ ?सीमा परगोली खाने कोजो सीना आगे आता हैउन सीनों में दिल मेरा हैये तुम्हें समझ नईं आता है ?शहरों में गाली सुनता हूँगांवों में वोटर जनता हूँजब कभी पुकार कोई आए तो'सुन ओ गवांर !'भी सुनता हूँअब ये क्या किया ?पाप है यह...कैसा पैशाचिक मानस हैनीच नराधम कर्म है यहयह हत्या से भी बढ़कर हैअधिग्रहण तो पहले होता थायह ग्रहणबलात-हरण है अबदेखो ! किसान को मत छेड़ोवो पहले से ही शापित हैयदि फुंकार उठी ज्वालासिंहासन भस्म हुए समझो