कविता
जीवन संगिनी
क़ीमत चुकाई, तो मालूम होगाजो यूँ ही मिला है, फ़रिश्ता हो शायदतुम पर ख़ुदा की मेहरबानियाँ हैंये जलवा उसी का करिश्मा हो शायदजिसे तुम मुहब्बत को तरसा रहे होवो ख़ुद को ख़ुशी से सताता हो शायदहरदम कसौटी पे क्यूँ कस रहे होकहीं तुम जो पीतल, वो सोना हो शायदतुम अपने मंदिर के भगवान होगेवो विस्तार अपना छुपाता हो शायदउसे सारी दुनिया दिखा दो तो क्या हैतुम्हें आइना वो दिखाता हो शायदये दुनिया तुम्हारी औ तुम इसके सूरजतुम्हें रात को वो सुलाता हो शायद