आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

ये मुमकिन नहीं

हो सकता हैसूरज न निकले कलरूक जाएँ नदियाँ भीहंसिनी भूल करहंस कोउड़ जाए, किसी दूर दिशा मेंदूर कहींअपनी ही कस्तूरीभूलें हिरनछोड़ चंदन वृक्षचले जाएँ भुजंगतरस जाय सावन भीन चले पुरवाईभूल जाए कोयलइठलाती अमराईअपनी बेनूरी पे नर्गिसभूल जाए रोनाछोड़ दें मोरअपने पैरों परउदास होनाशायद ये सब कुछ हो भी जाएमगर ये मुमकिन नहींकि मुझे तेरी याद न आए