आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

दिलों के टूट जाने की

नहीं आवाज़ होती है, दिलों के टूट जाने कीज़रूरत क्या है फिर तुमको, इसे सुनने-सुनाने कीमेरे तन्हाई के आलम में सारे ख़ाब फीके थेतुम्हारी ज़िद थी फिर इनको, बहारों से सजाने कीजो मैं था वो तो रहने ही कहाँ तुमने दिया मुझकोजो मैं अब हो गया तुम सा, तो ज़िद है छोड़ जाने कीमैं ख़ुश कितना हूँ ये तुमको बताने के लिए आयातुम्हें फ़ुर्सत कहाँ नाचीज़ को दिल से लगाने कीहज़ारों ख़्वाइशों को छोड़ के तुमको ही चाहा थातुम्हें बेचैनियां रहती हैं अब सारे ज़माने की