आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

मैं हूँ स्तब्ध सी

मैं हूँ स्तब्ध सीये देख कर अस्तित्व तेराकितना है ये किसकाकितना ये है मेरामुझ से तुझको जोड़ातुझको मुझसे जोड़ाऐसे, इस तरहा सेकिसकी ये माया हैकैसे तू आई हैपंखों की रचना हैरिमझिम सी काया हैझिलमिल सा साया हैतू जब भी रोती हैसपनों में खोती हैशैतानी बोती हैतुझको मालुम क्याऊधम है तेरा क्याघर-भर के रहती हैपल भर में बहती हैगंगा और जमना क्याआखों में रहती हैजब भी तू कहती हैमम्मा-अम्मा मुझकोजाने क्या सिहरन सीरग-रग में बहती हैतेरा जो पप्पा हैपूरा वो हप्पा हैदांतो से काट-काटगोदी में गप्पा हैमैं हूँ अब ख़ुश कितनीये किसको बतलाऊँसमझेगा कौन इसेकिस-किस को समझाऊँयूँ ही इक बात मगरकहती हूँ तुम सबसेबच्चे ही आते हैंईश्वर का रूप धरेइनकी जो सेवा हैअल्लाह की ख़िदमत हैसाहिब का नूर हैं येईश्वर की मेवा हैइनमें हर मंदिर हैइनमें हर मस्जिद हैगिरजे और गुरुद्वारेइनके ही सजदे हैंकोई भी बच्चा होकितना भी झूठा होकितना भी सच्चा होबस ये ही समझो तुमउसके ही दम से तोये सारी दुनिया हैउससे ही रौशन हैंसूरज और तारे सबउसकी मुस्कानों मेंजीवन की रेखा है