आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

मर गए होते

मरना ही शौक़ होता तो मर गए होतेजायज़ अगर ये होता तो कर गए होतेमालूम गर ये होता बुरा मानते हो तुमइतने तो शर्मदार हैं, क्यों घर गए होतेइक दोस्ती का वास्ता तुमसे नहीं रहापहचान भी तो रस्म है, वो कर गए होतेउस मुफ़लिसी के दौर में हम ही थे राज़दार[1]आसाइशों की बज्म़ दिखा कर गए होते[2][3]हर रोज़ मुलाक़ात औ बातों के सिलसिलेइक रोज़ ख़त्म करते हैं, वो कर गए होतेमाज़ूर बनके क्या मिलें अब दोस्तों से हम[4]कुछ दोस्ती का पास निभा कर गए होते[5]पहले बहुत ग़ुरूर था तुम दोस्त हो मेरेअब दुश्मनी के तौर बता कर गए होते[6]'बंदा' नहीं है मुंतज़िर अब रहमतों का यार[7][8]ताकीद हर एक दोस्त को हम कर गये होते[9]

संदर्भ

  1. ↑ मुफ़लिसी = ग़रीबी
  2. ↑ आसाइश =समृद्धि
  3. ↑ बज़्म = सभा, महफिल
  4. ↑ माज़ूर = जिसे किसी श्रम या सेवा का फल दिया गया हो, प्रतिफलित
  5. ↑ पास = लिहाज़
  6. ↑ तौर = आचरण
  7. ↑ मुंतज़िर = इंतज़ार या प्रतीक्षा करने वाला
  8. ↑ रहमत = दया
  9. ↑ ताकीद = कोई बात ज़ोर देकर कहना