आदित्य चौधरीकविता · व्यंग्य · सम्पादकीय

कविता

रात नहीं कटती थी रात में

रात नहीं कटती थी रात में, अब दिन में भी कटी नहींऐसी परत जमी चेहरों पर, कोहरे की फिर हटी नहींमस्त ज़िन्दगी जी लो यारो, इसमें कोई हर्ज़ नहींसंजीदा रिश्ते को तलाशो, तो दिन रातों चैन नहींदूर हैं हम जो तुमसे इतने, ये अपनी तक़्दीर नहींइल्म नहीं है हमको जिसका, साज़िश है तदबीर नहींवक़्त निगेहबाँ होता जब, ख़ाबों में रंग होते हैंएक ख़ाब मैंने भी देखा, जिसकी कहीं ताबीर नहींउसे भुला दूँ जिसमें बसा था, पूरा ये संसार मिराशक़ की बिनाह पर मुझको छोड़ा, कोई बहस तक़रीर नहींइसने टोका उसने पूछा, क्यों किस्मत क्या खुली नहीं ?रात नहीं कटती थी रात में, अब दिन में भी कटी नहीं