कविता
वक़्त बहुत कम है
वक़्त बहुत कम है और काम बहुत ज़्यादा हैहर एक लम्हे का दाम बहुत ज़्यादा हैफ़ुर्सत अब किसको है रिश्तों को जीने कीवीकेन्ड वाली इक शाम बहुत ज़्यादा हैचौपालें सूनी हैं, मेलों में मातम हैकहीं पे रहीम कहीं राम बहुत ज़्यादा हैखुल के हँसने की जब याद कभी आए तोपल भर को झलकी मुस्कान बहुत ज़्यादा हैकोयल की तानें तो अब भी हैं बाग़ों मेंलेकिन अब बोतल में आम बहुत ज़्यादा हैजिस्मों के धन्धे को लानत अब क्या भेजेंइसमें भी शोहरत है, नाम बहुत ज़्यादा हैसाझे चूल्हे में अब आग कहाँ जलती हैशामिल रहने में ताम-झाम बहुत ज़्यादा हैबस इक मुहब्बत का आलम ही राहत हैलेकिन ये कोशिश नाक़ाम बहुत ज़्यादा है