कविता
अपना भी कोई ख़ाब हो
इस ज़िन्दगी की दौड़ में, अपना भी कोई ख़ाब होअलसाई सी सुबह कोई, शरमाया आफ़ताब होवादों की किसी शाम से, सहमी सी किसी रात मेंइज़हार के गीतों को गुनगुनाती, इक किताब होछूने के महज़ ख़ौफ़ से, सिहरन भरे ख़याल मेंधड़कन के हर सवाल का, साँसों भरा जवाब होमिलना हो यूँ निगाह का, पलकों के किसी कोर सेज़ुल्फ़ों की तिरे साये में, लम्हों का इंतिख़ाब होफ़ुरसत की दोपहर कोई, गुमसुम से किसी बाग़ मेंमैं देखता रहूँ तुझे और वक़्त बेहिसाब हो